​एक बावरी नदी से मुलाक़ात हुई, दिन निगल के बैठी थी। भाप उगलती रह-रह के, मानो खुद में- कोई आग छिपाये बैठी थी। अजब दो पहलू हैं उसके कुछ ग़ज़ब सा मिज़ाज है, दूसरी नदियों से अलग है, लेकिन फिर भी सबसे ख़ास है। छूने की कोशिश की जिसने हाथ जलाये रह गया, जो आया […]

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