वक्त

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वक्त दोड़ता रहा हवाओं की गति लेकर,
मेरे दामन में सिकयातो के गुलो की बहार आई...
रोज रोकते थे ठहरने को एक पल,
मगर वक्त को इल्तजा भी न राश आई...
उधड के रह गये जेसे चादर की तार हो,
मगर रुलाने वालो को एक पल भी न याद आई...
सिकायत कर के ज़माने को मुहब्बत की कहानी कह दू,
मगर हर लफ्ज में उस बेगाने की याद आई...
सता जाती है वो ठंडी हवा ऐसे, 
जेसे उनकी सांसो से निकली हो महकती फुरवाई,
सिहर के कोने को मकां कर डाला,
उस जालिम को सिर्फ हवेलिया ही रश आई,
बोझिल होती है खुमारी में तेरी ये आँखे,
बंद होने को है जालिम, लेकिन न तू लोट पायी......
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