कुछ स्थिरता मिली होती,  जहन में जंग हैं, सवालो की। रुद्रन को है प्याशी, आँखे, एक ज़माने से। कव्वाली की ताली सी, हर रोज बदलती हैं, कुछ टूट गया हैं बितर, क्या यही उगलती है? कल रातें बिस्तर में, करवट बदलती थी, कुछ अटक गया दिल में? यूँ नींद सुलगती थी। जग सो गया लेकिन, […]

Read more of this post